मराठो का गौरवशाली इतिहास
सिंधिया वंश के राजचिह्न में सूर्य के दोनों और फन फैलाये नागों को शामिल किया गया है। लेकिन ये बहुत कम लोग ही जानते हैं कि आखिरकार ये राजचिह्न बना कैसे? इसमें सूर्य के साथ कोबरा कैसे शामिल हुआ?
सोते हुए महादजी की छत्र बन कर की थी नागों ने रक्षा
सिंधिया राजवंश की स्थापना महादजी सिंधिया ने की थी। महादजी और उनके भाई 1761 में मराठों और अहमद शाह अब्दाली के बीच हुई पानीपत की लड़ाई में शामिल हुए थे। मराठों को करारी हार झेलनी पड़ी थी। महादजी सिंधिया अकेले ही बचे रह गए थे। अपने बचे-खुचे सैनिकों के साथ महादजी वहां से अपनी मालवा जागीर का हिस्सा रहे ग्वालियर की ओर रवाना हुए। थके-हारे महादजी जंगली मैदान में सो गए। इसी दौरान शत्रु सैनिक भी उन्हे तलाश करते उधर से गुजरे, लेकिन वो सोते हुए महादजी का कुछ नहीं बिगाड़ सके। दरअसल दो नाग अपने फनों की छाया महादजी पर किए हुए थे। ये देख कर शत्रु सैनिकों के होश उड़ गए और वहां से भाग खड़े हुए। तब तक महादजी के सैनिक भी वहीं पहुंच गए। आवाज सुन कर महादजी की नींद खुल गई। महादजी के जागते ही, नाग चुपचाप वहां से चले गए।
सूर्यवंश और रक्षा करने वाले नाग बने राजचिह्न
इसके बाद महादजी ने अपने परिश्रम और दूरदर्शिता से दोबारा सैनिकों को संगठित किया और ग्वालियर से मालवांचल तक सिंधिया साम्राज्य की स्थापना की। सिंधिया राजवंश की आखिरी महारानी और भाजपा में राजमाता के तौर पर संबोधित की जाती रहीं विजयाराजे सिंधिया की आत्मकथा में इस बात का उल्लेख है कि सिंधिया वंश को इतिहासकारों ने नागवंशी सेन्द्रक वंश से माना था। महादजी सिंधिया की मां राजस्थान की हाड़ा राजकुमारी थीं। दोनों सूर्यवंशी क्षत्रिय कुल थे, लिहाजा राज्य स्थापना के बाद महादजी ने सूर्य के साथ अपनी रक्षा करने वाले नागों को भी अपने राजचिह्न में शामिल कर लिया ।
शिंदे / सिंधिया कुल का कूलाचार








ध्वज पर निशान = दोनो तरफ फल फैलाये नाग और बीच मे सुर्य ।










No comments:
Post a Comment